देश मनोरोग की तरफ जा रहा है…

भारत आगे बढ़ रहा है। लोग तरक्की कर रहे हैं लेकिन इस बीच देश में मनोरोग की शिकायत भी काफी बढ़ गई है। लोगों को काफी सावधानी बरतने की जरुरत है। जानकारी बताती है कि दुनिया के करीब एक-तिहाई मनोरोगी भारत और चीन में हैं। इससे साफ तौर पर जाहिर है कि भारत डिप्रेशन के मुश्किल दौर से गुजर रहा है। ऐसे में मनोरोग के लक्षण को समझना जरूरी हो जाता है।

जानकारी बताती है कि देश में आज के दौर में डिप्रेशन यानी अवसाद से देश की 9 प्रतिशत आबादी परेशान है और इसके चलते लोग आत्महत्या जैसे गंभीर कदम उठा रहे हैं | अवसाद के लक्षणों को अगर समय से पहचानकर इन्हें दूर करने का प्रयास किया जाए तो इससे छुटकारा पाया जा सकता है और साथ ही मेन्टल हेल्थ जैसी चुनौतियों को मुंह-तोड़ जवाब भी दिया जा सकता है। बस जरूरत है जागरूकता और एक मजबूत कदम की

एक अनुमान के मुताबिक दुनिया में करीब 45 करोड़ मनोरोगी हैं जिनमें से 17 प्रतिशत लोग चीन के और 15 प्रतिशत भारत के हैं। विकसित देशों की तुलना में भारत और चीन में मनोरोगियों की तादाद बहुत ज्यादा है | सरकार का भी मानना है कि भारत में हर 5 में से एक व्यक्ति को मनोचिकित्सक की सलाह की जरूरत है | उधर WHO की एक रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2015 में भारत में 5 करोड़ मानसिक रोगी थे| दक्षिण एशियाई देशों में सबसे ज्यादा डिप्रेशन के मरीज भारत में ही रहते हैं |
भारत में 3 करोड़ लोग एंग्जाइटी यानी घबराहट के शिकार हैं, एंग्जाइटी का शिकार व्यक्ति कई बार आत्महत्या जैसा कदम भी उठा लेता है | डब्ल्यूएचओ के अनुसार 2005 से 2015 तक पूरी दुनिया में डिप्रेशन के मरीजों की संख्या 18.4 प्रतिशत तक बढ़ चुकी है और दुनिया भर के 50 प्रतिशत लोग भारत और चीन में रहते हैं |

पूरी दुनिया में होने वाली कुल मौतों में आत्महत्या की हिस्सेदारी 1.5 प्रतिशत है |
डिप्रेशन के 78 प्रतिशत मरीज निम्न और मध्यम आय वाले देशों में रहते हैं |
वर्ष 2012 में पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा आत्महत्याएं भारत में हुई थीं |
2015 के मुकाबले 2016 में भारतीयों ने डिप्रेशन की दवाएं ज्यादा खाईं |
वर्ष 2015 के मुकाबले 2016 में डॉक्टरों ने एंटी डिप्रेशन दवाओं के 14 प्रतिशत पर्चे ज्यादा लिखे |
( स्रोत डब्ल्यूएचओ रिपोर्ट )

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