जाने क्यों पसंद आया चीन को महाबलीपुरम

समुद्र के किनारों पर बसा शहर महाबलीपुरम वैसे तो तमिलनाडु के आम शहरों के जैसा ही है। इस शहर का इतिहास बहुत ही प्राचीन और भव्य है। हम आपको इस शहर की कहानी बता रहे हैं…

महाबलीपुरम शहर का नामांकन : महाबलीपुरम शहर का नाम महान दानवीर असुर राजा महाबली के नाम पर रखा गया था। कहा जाता है कि महाबली ने विष्णु के वामन अवतार को तीन पग भूमि दान में दी थी। वामन भगवान ने दो पग में त्रिलोक्य नाप दिया और फिर पूछा कि राजन तीसरा पग कहां रखूं तो महाबली ने कहा कि भगवन अब बस मेरे सिर ही बचा है आप उसी पर अपना पग रख लें। महाबली की दानवीरता और सत्यता से प्रभावित होकर वामन भगवान ने उन्हें पाताल लोक का चिरंजीवी राजा बनाकर खुद वहां के पहरेदार बन गए। कहते हैं कि आज भी महाबली जिंदा हैं। केरल में उनकी पूजा होती है।

कहते हैं कि बाद में पल्लव राजा नरसिंह वर्मन, जिन्हें मामल्ला के नाम से जाना जाता था उन्होंने महाबलीपुरम का नाम मामल्लापुरम रख दिया था। राजा नरसिंह वर्मन के द्वारा महाबलीपुरम का नाम मामल्लापुरम रखने पर भी आज लोग इस स्थान को महाबलीपुरम के नाम से ही ज्यादा जानते हैं।
7वीं और 10वीं सदी के पल्लव राजाओं द्वारा बनाए गए कई मंदिर और स्थान यहां की शोभा बढ़ा रहे हैं। कांचीपुरम पर राज करने वाले पल्लवों की यह दूसरी राजधानी थी। गुप्त राजवंश के पतन के बाद पल्लव राजाओं ने दक्षिण भारत में राज किया। उन्होंने लगभग 3री सदी से 9वीं सदी के अंत तक अपना दबदबा बनाए रखा। पल्लव राजाओं के शासन काल के दौरान कई महान कवि, नाटक कार, कलाकार, कारीगर, विद्वान और संत हुए थे। कारीगरी के मामले में पल्ववों का साम्राज्य अग्रिण था।

बोधिधर्म : पल्वव राजाओं के राज में ही महान भिक्षु बोधिधर्म थे। बोधिधर्म का जन्म दक्षिण भारत के पल्लव राज्य के कांचीपुरम के राज परिवार में हुआ था। वे कांचीपुरम के राजा सुगंध के तीसरे पुत्र थे। छोटी आयु में ही उन्होंने राज्य छोड़ दिया और भिक्षुक बन गए।
22 साल की उम्र में उन्होंने संबोधि (मोक्ष की पहली अवस्था) को प्राप्त किया। दुनिया के महान भिक्षुओं में से एक बोधी धर्मन को जो नहीं जानता वह मार्शल आर्ट के इतिहास को भी नहीं जानता होगा। चीन में मार्शल आर्ट और कुंग फू जैसी विद्या को सिखाया था बोधी धर्मन ने। प्रबुद्ध होने के बाद राजमाता के आदेश पर उन्हें सत्य और ध्यान के प्रचार-प्रसार के लिए चीन में भेजा गया था।
 
राजा महाबली : राजा बलि का राज्य संपूर्ण दक्षिण भारत में था। उन्होंने महाबलीपुरम को अपनी राजधानी बनाया था। प्रसिद्ध पौराणिक पात्र वृत्र (प्रथम मेघ) के वंशज हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद था। प्रह्लाद के पुत्र विरोचन का पुत्र महाबली था। दरअसल, कश्यप ऋषि की पत्नी दिति के दो प्रमुख पुत्र हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष थे। हिरण्यकश्यप के 4 पुत्र थे- अनुहल्लाद, हल्लाद, भक्त प्रह्लाद और संहल्लाद। प्रह्लाद के कुल में विरोचन के पुत्र राजा बलि का जन्म हुआ। महाबली ने समुद्र मंथन में हिस्सा लिया था।
महाबलीपुरम के मंदिर : कहा जाता है कि यहां प्राचीनकाल में सैंकड़ों मंदिर थे। यह स्थान कई भव्य मंदिरों, स्थापत्य और सागर-तटों के लिए बहुत प्रसिद्ध था। महाबलीपुरम् के बारे में माना जाता है कि इसके तट पर 17वीं शताब्दी में 7 मंदिर स्थापित किए गए थे और एक तटीय मंदिर को छोड़कर शेष 6 मंदिर समुद्र में डूब गए थे।
1.शोर मंदिर- महाबलीपुरम के समुद्र तट पर स्थित यह मंदिर प्राचीन वास्तु कला का उदहारण है। भगवान शिव और विष्णु को समर्पित शोर मंदिर का निर्माण लगभग 700-728 ईस्वी के समय हुआ था। इस स्टोन टेम्पल इसलिए कहते हैं क्योंकि मंदिर वाला भाग ग्रेनाइट पत्थर से बना हुआ है जो देखने में बहुत ही सुंदर दिखता है। मंदिर के प्रांगण में सात पगोडा की पत्थर की मूर्तियां हैं जिन्हें देखना अद्भुत है। इस मंदिर की अलग ही कथा है।
2. पंच रथ मंदिर- महाबलीपुरम के समुद्री तट पर दूसरा मंदिर पंच रथ या पंच पांडवों का रथ नामक मंदिर है। यह एक सुन्दर स्मारक परिसर है जिसका निर्माण 7वीं सदी में महेंद्र वर्मन प्रथम और बेटे नरसिंह वर्मन प्रथम ने करवाया था। पंच रथ के पांच स्मारकों को पूरी तरीके से रथ के समान बनाया गया है जो सभी ग्रेनाइट पत्थर को खोद-खोद कर बनाए गए हैं। इसमें महाभारत की कहानी को दर्शाते हुए कलाकृतियां देखने को मिलती हैं। यह सभी रात बड़े से छोटे आकार में इस प्रकार से हैं- धर्मराज रथ, भीम रथ, अर्जुन रथ, नकुल एवं सहदेव रथ और द्रौपदी रथ।
3.गंगा अवतरण का स्मारक- यह गंगा अवतरण के स्मारक महाबलीपुरम के कोरोमोंडल तट पर कांचीपुरम जिले में स्थित हैं। 96X43 फीट का यह स्मारक सुंदर कलाकारी को दर्शाता है। यह एक बड़ा पत्थर है जसमें खोद-खोद कर गंगा की उत्पत्ति का बहुत ही अद्भुत चित्रण किया गया है।
4.टाइगर गुफाएं-यह गुफाएं महाबलीपुरम की सबसे बेहतरीन कलाकृतियां हैं। इनके बाहर पत्थर में उभरे हुए शेर की मूर्तियां हैं। यह भी पल्लव राजाओं द्वारा बनाया गया था।
5.कृष्ण की मक्खन गेंद-दक्षिण भारत के महाबलीपुरम में 1200 वर्ष पुराना एक पत्थर बहुत ही अजीबोगरीब तरीके से रखा हुआ है। इसे देखकर लगता है कि यह जरा से टल्ले में नीचे गिर पड़ेगा, लेकिन ऐसा नहीं है। इस पत्थर की चौड़ाई 5 मीटर तथा ऊंचाई 20 फीट है। सन् 1908 में इस पत्थर पर उस समय के मद्रास गवर्नर आर्थर की नजर पड़ी तो उनको लगा कि यह पत्थर किसी बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकता है इसलिए उन्होंने इस पत्थर को उसके स्थान से हटवाने के लिए 7 हाथियों से खिंचवाया पर यह पत्थर अपनी जगह से 1 इंच भी नहीं खिसका।
ग्रेविटी के नियमों की उपेक्षा करते हुए यह पत्थर एक ढलान वाली पहाड़ी पर 45 डिग्री के कोण पर बिना लुढ़के टिका हुआ है। लोग इस पत्थर को ‘कृष्ण की मक्खन गेंद’ भी कहते हैं क्योंकि उनका मानना है की यह पत्थर मक्खन की गेंद है जिसको कृष्ण ने अपनी बाल्य अवस्था में नीचे गिरा दिया था।

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