ग्रेटा ने दुनिया को गांधी की याद दिला दी

प्रसून लतांत : स्वीडन की पंद्रह साल की ग्रेटा थुनबर्ग के ग्लोबल वार्मिंग के मुद्दे पर उनके वैश्विक हो गए आंदोलन ने सैकड़ों देशों को महात्मा गांधी के सत्याग्रह की याद दिला दी है। स्वीडिश जलवायु कार्यकर्ता ग्रेटा ने पिछले साल अगस्त से अहिंसक सविनय अवज्ञा के गांधीवादी सिद्धांत पर एक वैश्विक आंदोलन शुरू कर दिया है। पिछ्ले मार्च में एक शुक्रवार को ग्रेटा के शूरू किए गए फ्राइडे फार फ्यूचर अभियान के तहत दुनिया भर के स्टूडेंट्स लाखों की संख्या में खासतौर से यूरोप के कई राजधानियों में स्कूलों और कालेजों से बाहर चले आए। ठीक वैसी ही पहल जैसी पहल महात्मा गांधी ने सौ साल पहले की थी। गांधी के सत्याग्रह का जीवंत स्वरूप दुनिया के 125 देशों के 1664 शहरों में देखा गया।

ग्रेटा ने अपने आंदोलन को जलवायु न्याय का संघर्ष कहते हुए अपनी उम्र के किशोरों से अपील की है मौजूदा समय में दुनिया भर में पर्यावरण के बिगड़ने की शुरुआत हो चुकी है और हमारे लिए अब कोई भविष्य नहीं है इसलिए इसके लिए लडें। उनका यह भी कहना है कि हमें यह स्वीकार करना होगा कि पुरानी पीढ़ी विफल हो गई है। ग्रेटा जलवायु परिवर्तन से होने वाले व्यापक नुकसान पर बोलते समय किसी से नहीं डरती है। ट्रम्ट से भी नहीं।

ग्रेटा थुनबर्ग ने दुनिया के विभिन्न देशों को अपनी ओर आकृष्ट कर लिया है। टाइम पत्रिका ने उसे दुनिया के सौ सबसे प्रभावशाली लोगों की सूची में शामिल किया। उसे नोबल शांति पुरस्कार के लिए भी नामित किया जा चुका है।
पिछले साल अगस्त के महीने में स्वीडन की पंद्रह वर्षीया लड़की ग्रेटा थुनबर्ग ने बेहतर पर्यावरणीय भविष्य की मांग करते हुए स्कूल से निकल कर स्वीडिश संसद की सीढ़ियों पर बैठने का फैसला कर लिया। उसने हाथ में ‘सुरक्षित जलवायु के लिए स्कूल से हड़ताल’ की तख्ती ले रखी थी। ग्रेटा की दिलचस्पी छह साल पहले जलवायु का विज्ञान समझने में हुई और यथासंभव हर तरह की जानकारी उसने जमा करना शुरू कर दिया। जब जरूरत हो तभी बत्ती जलाना, अनिवार्य जरूरत के अतिरिक्त कोई सामान न खरीदना, पानी के किफायत से इस्तेमाल करना, सोलर बिजली का प्रयोग, जैविक खेती और हवाई यात्रा से परहेज जैसे उपाय उसने अपना लिए। शुरू—शुरू में उसके माता—पिता और मित्रों—परिचितों के साथ—साथ स्कूल प्रबंधन ने उसे ऐसा करने से रोकने की कोशिश की पर उसके दृढ़ संकल्प के सामने किसी की नहीं चली। अलबत्ता अपने विचारों को जन—जन तक फैलाने के लिए एक पर्चा तैयार किया। ग्रेटा ने इस पर्चे में लिखा— मैं यह विरोध प्रदर्शन इसलिए कर रही हूं, क्योंकि आप बुजुर्गों—वरिष्ठों ने हमारे भविष्य को गटर में फेंक दिया है। मुझे यह अपना दायित्व लगता है कि वह काम जरूर करूं, जो एक इंसान के तौर पर मैं कर सकती हूं। स्कूल की कक्षाओं से निकल कर ऐसे प्रदर्शन करने की आलोचना का जवाब देते हुए ग्रेटा कहती हैं— उस भविष्य के लिए क्या पढ़ाई करना जो हमसे छीना जा रहा है। मैं बेहतरी के लिए एक पहल कर रही हूं, जो चल रहा है, उसको अवरुद्ध कर रही हूं।
ग्रेटा के इन प्रयासों को अब व्यापक समर्थन मिल रहा है। देखते—देखते एक अकेली लड़की द्वारा शुरू किया गया विरोध प्रदर्शन पूरी दुनिया में फैल गया। इस साल 15 मार्च को दुनिया भर के सवा सौ देशों के करीब पंद्रह लाख किशोर ग्रेटा द्वारा शुरू किए गए पर्यावरण आंदोलन के समर्थन में सड़कों पर निकले। दुनिया भर के हजारों वैज्ञानिकों ने लिखित वक्तव्य जारी कर उन मुद्दों का समर्थन किया है, जो ग्रेटा ने उठाए हैं। ‘साईंस’ पत्रिका के अप्रैल अंक के अनुसार दुनिया के विभिन्न देशों के तीन हजार से ज्यादा वैज्ञानिकों ने युवाओं द्वारा उठाए गए मुद्दों के समर्थन में एक वक्तव्य जारी किया है। वक्तव्य में कहा गया है कि यदि मानवता तत्काल कदम बढ़ाकर नियमित ढंग से ग्लोबल वार्मिंग को काबू में नहीं करती, जीवों और वनस्पतियों का आसन्न महाविनाश नहीं रोकती, भोजन की आपूर्ति का कुदरती आधार नहीं बचाती और वर्तमान तथा भविष्य की पीढ़ियों की सलामती सुनिश्चित नहीं कर पाती, तो साफ—साफ यह मान लेना होगा कि हमने अपने सामाजिक, नैतिक और ज्ञानाधारित दायित्वों का निर्वहन नहीं किया। वक्तव्य में ग्रेटा सहित दुनिया भर के लाखों युवाओं के विरोध प्रदर्शन को समर्थन करते हुए कहा गया है कि युवा प्रदर्शनकारियों की समाज को व्यवहार्य बनाने के वास्ते इन उपायों को लागू करने की मांग बिल्कुल उचित और न्यायसंगत है। सख्त, बेबाक और अविलंब कदमों के उठाए बगैर उनका भविष्य खतरे में पड़ जाएगा। ग्रेटा संयुक्त राष्ट्र महासचिव, यूरोपीय संसद प्रमुख, विश्व बैंक प्रमुख, दावोस में वर्ल्ड इकोनोमिक फोरम प्रमुख और पोप के साथ विचारों का आदान—प्रदान कर चुकी है। बर्लिन के विशप ने ग्रेटा की तुलना यीशू मसीह के साथ की तो प्रमुख जर्मन टीवी एंकर ने चे ग्वेवारा का नया अवतार बताया।
ग्रेटा विभिन्न देशों में जाकर अलख जगाती है, भाषण देती है पर ग्रीनहाउस गैसों का अत्यधिक उत्सर्जन करते वक्त हवाई यात्रा नहीं करती। ग्रेटा का दुख यह है कि दुनिया बचाने के लिए जलवायु संबंधी जितनी भी नीतियां बनाई जा रही हैं, वे 2050 के आगे नहीं देखती — तब तक जो मैं अपना आधा जीवन भी जी नहीं पाऊंगी।

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