बिहार के नेता कब तक जनता के खून पर जिंदा रहेंगे?

कौन सुध लेगा बिहार की…

Vikas Kumar: बिहार में बाढ़ है… नीतीश कुमार है। कमाल है ना… ये नारा जो नीतीश के चुनावी नारे से मेल खाता है।

सोचने समझने वाली बात यह है कि नीतीश के सुशासन जो की अब कुशासन में बदल गया है। राजधानी पटना में लोग त्रस्त हैं और सड़क पर कोई नेता दिख नहीं रहा। नेता अक्सरहां बड़े होटलों में नजर आते हैं।

हालात यह हो गई की उपमुख्यमंत्री तक को बड़ी परेशानी के बाद उनके घर से निकाला गया। वह सड़क पर आम जन की तरह ही बेबस दिखे। पिछले इतने सालो से सुशील कुमार बिहार पर राज कर रहे है और हालात ने इनको क्या से क्या कर दिया, पिछले दिनों बाढ़ के सवाल पर Super-30 फिल्म का हवाला दे रहे थे… पर सवाल यह नहीं है की पटना परेशान है… लोग भाग रहे हैं।

सवाल यह है कि जब किसी एक राजा के रहते राजधानी पिछले 15 सालों में नहीं सुधर पाई तो उस राजा की जरुरत क्या है ?

दूसरा सवाल यहीं से खड़ा होता है कि जब राजधानी का हाल बेहाल है तो बाकी इलाको का क्या होगा ?

इसके इतर अगर आप राज्य के नेतृत्व की बात करें तो वह खाली सा दिखता है। सत्ता पक्ष से केवल मुख्यमंत्री दिखाई दिये बाकी कोई नेता सड़क पर दिखाई नहीं दिया तो मेयर, नगर निगम कहां सो रहा था कोई पता नहीं। जाहिर तौर पर सवाल सिर्फ नीतीश पर सिमट कर रह गया। जो सवाल का जवाब अपने कुतर्कों से दे रहे थे। बाकी नेता मंत्री सामने आने तक की जरुरत नहीं समझा।

खैर ये तो सत्ता की बात हुई। लेकिन सवाल विपक्ष से भी पुछा जाना चाहिए। वजह  इस दौरान एक खास जगह होती है विपक्ष की लेकिन सिर्फ टीवी पर चेहरा चमकाने के अलावा पुरा विपक्ष सड़क पर कहीं नहीं दिखा केवल पप्पु यादव अपने समर्थकों के साथ दिखाई दिये। वे परेशान से थे और जनता की आवाज बन रहे हैं।

पुरा पटना समुंद्र के सैलाव सा दिख रहा था। 4-5-6 फीट तक पानी सड़को पर था। लोग घरों के छत पर थे। खाना ऐसा की जानवर भी ना खा पाए और प्रशासन पस्त तो प्रतिपक्ष हरियाणा में अपने बहनोंइ के नामांकन में मस्त दिखे जबकी जनता यहां परेशान….कमाल के कर्णधार है ये लालू के लाल।

यह कहानी इसलिए है कि

आने वाले दौर में बिहार में चुनाव है जनता किसको वोट करेगी ?

कौन होगा बिहार का कर्णधार ?

यह सवाल इसलिए उठ रहा है कि 15 साल लालू परिवार का शासन और फिर 15 साल नीतीश कुमार का शासन जनता ने देखा है और विकास वहीं का वहीं तो फिर वोट किसको । क्योंकि लालू और नीतीश ने नए दौर में नेताओं की एक ऐसा वैक्यूम खड़ी कर दि है जिसे जनता को पाटना बहुत मुश्किल है। राजनीति के गढ़ में राजनीति ही गायब कर दिया है नीतीश और लालू ने… जनता निरीह सिर्फ इनके देखने के अलावा कुछ कर नहीं सकती। और ये लोग ग्वाले की तरह दूध नहीं बल्की राक्षस की तरह जनता का खुन पिकर जिंदा है।

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