फिल्म कबीर सिंह की सफलता क्या हमारे समाज पर कलंक नहीं है

Sunil Mishra: कबीर का नाम सुनते ही हमारे मन में साम्प्रदायिक सदभाव वाला कवि याद आता है। लेकिन हम परंपरा पुरुषों की स्मृतियों को तहस नहस कर रहे हैं।

हम किसलिए जिंदा है। केवल हम भाग रहें हैं … बिना सोंचे-समझे…और किधर भाग रहें हैं पता नहीं, पर भाग रहें हैं। कहीं किसी की हत्या होती है, तो किसी के साथ बलात्कार होता है। फिर कहीं लूट-पाट होती है और हम या तो चुपचाप सह लेते हैं या बहुत होता है तो मोमबती जलाकर बुजदिलों की तरह अपने-अपने इलाके में मार्च करते हैं। सरकार को कोसते है, गरिआते हैं पर हम खुद नहीं सुधरते हैं।

अब आप कहेंगे कि समाज ने कौन सी गलती कर दी जो ऐसे उलाहना देने पर तुले हैं। अगर आपको समझ नहीं आ रही है कि आप से कुछ गलती हुई है तो मैं कुछ बातों को आपके सामने रखता हूँ और आप ही तय कीजिएगा कि मेरे ज़रिये कही गई बातें सही है या गलत। क्योकि आज हम बात कर रहे है एक ऐसे समाज की, जो कबीर सिंह फिल्म ने समाज के सामने दर्शाया है।

फिल्म कबीर अभी नई-नई रिलीज़ हुई है। 100 करोड़ के क्लब में शामिल है। लोग सिनेमा हॉल में हीरो की हर हरक़त पर तालियां बजा रहे हैं। चाहे वह किसी को गाली दे रहा हो या पीट रहा हो या बलात्कार करने की बात करता हो अपने दोस्तों और उनके काम को नीचा दिखाता हो, अपने कॉलेज के डीन का अपमान करता हो, अपनी दादी पर चिल्लाता हो और अपने घर में काम करनेवाली बाई के एक कांच का गिलास ग़लती से तोड़ देने पर उसे चार मंज़िलों की सीढ़ीयों पर दौड़ाता हो।

दरअसल सीधी और सपाट भाषा में कहें तो ये किरदार एक गुंडा है जिसे हम आप हीरो बना रहें हैं तो घर में हीरो कहां से लाएंगे और आपके नौनिहाल तो यही सीखेंगे ना।

एक बात और, जहां हमारे समाज में किसी गुंडे को अच्छे लोग अपने घरों के आस पास फटकने नहीं देते, तो वहां एक औरत को काबू में रखनेवाले मर्दाना किरदार पसंद किए गए हैं। यह फिल्म पूरे समाज द्वारा काफी पसंद की जा रही है। और करोड़ों कमा रहीं हैं और अच्छी सोच से परे दकियानूसी ख्यालों को जायज़ ठहराती रही हैं।

अजीबो गरीब हेै कबीर सिंह का किरदार, कि वह शराबी हो जाता है पर उसके दोस्त उसका साथ नहीं छोड़ते बल्कि एक दोस्त तो उसे अपनी बहन से शादी का प्रस्ताव भी देता है.

और कहता है “मेरी बहन तेरे बारे में सब जानती है पर फिर भी तुझे बहुत पसंद करती है, तू उससे शादी करेगा?”

एक औरत के ग़म से बाहर निकलने के लिए दूसरी औरत का बलिदान…. सच बतलाईयेगा, क्या ताली बजाई थी ना आपने, पर यह भी देखिए यह कौन सा समाज गढ़ा जा रहा है… और भी कई चेहरे हैं इस फिल्म के मसलन

एक शराबी बदतमीज़ आदमी जो प्यार की चोट को वजह बनाकर किसी भी लड़की के साथ सोता है, फ़िल्म में प्यार के नाम पर हिंसा का जश्न मनाया जाता है। सिनेमा हॉल में ख़ूब तालियां बज रही हैं। सीटियों से हीरो का स्वागत हो रहा है।

अजीब है यह फिल्म, जो कबीर सिंह की हर नाज़ायज हरकतों के लिए जैसे ग़ुस्सा, शराब के प्रति दीवानापन, मरने की कोशिशें और ड्रग्स, हर लड़की को बस सामान समझना… इस सब की क़सूरवार वो प्रेमिका बना दी जाए.

और सारी हरकतें करने वाला वह कबीर सिंह एक हीरो बना दिया जाय वह भी दर्शको के जरिए …. वाह-वाही लूटी जाय… भई ये कौन सा समाज हम निर्माण कर रहें हैं, जरा सोंचिएगा कि इस फिल्म का आपके अपने घरों में क्या प्रभाव पड़ेगा और फिर इसे देखकर आपके बच्चे क्या बनेंगे, क्या सीखेंगेI

कोई मां कैसे इस तरह के बेटे को स्वीकार करेगी जो एक जंगली टाइप का आदमी है औरत को अपनी जागीर मानने वाला और ‘वो मेरी नहीं तो किसी और की भी नहीं होगी’ वाली मानसिकता वाला है। यह सोंचने बाली बात है।

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