क्यों बढ़ रहा भारतीय कम्पनियों का नुकसान !

दीपक पांडेय : किसी कम्पनी की तरक़्की में दो चीज़ों का महत्वपूर्ण योगदान होता है,कार्य शैली तथा कार्य कुशलता | लेकिन आज के समय में इन दोनों भागों में महज खानापूर्ति दिखाई पड़ती है या फिर यूँ कहें इनकी जगह चाटुकारिता ने ले ली है | महज अपने चंद निजी फायदे के लिए चाटुकार किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं |

ऐसा ही कुछ हाल है भारत के कम्पनियों का , जो आये दिन कम मुनाफा ,घटता व्यापार और दूसरे परेशानियों से जूझ रहे हैं | जहाँ भारत में संसाधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं वहीँ मानव संसाधनों की भी कोई कमी नहीं है, लेकिन अगर हम बात करें कार्य कुशलता की तो उसका भारी आभाव देखने को मिलता है और इन सबके पीछे एक ही कारण है चाटुकारिता और भाई -भतीजावाद |

जहाँ सार्वजनिक क्षेत्रों में आरक्षण ने बेडा गर्क कर रखा है वहीँ निजी क्षेत्रों को चाटुकारिता ने मटियामेट कर दिया है | किसी भी संस्थान को आगे बढ़ने के लिए कुशल प्रबंधन के साथ ही नए-नए कार्यों को सीखने, सही तरीका अपनाने, नए प्रयोग करने और संस्थान के कर्मचारियों को लगातार कार्य दक्षता के लिए तैयार करने की जरूरत है ,लेकिन भारतीय मानसिकता कहें या आदत इन सब पर चाटुकारिता भारी पड़ जाती है | इसका उद्धरण हाल ही में दिए गए कुछ आधिकारिक बयान हैं |

1) अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने है की एच् वन वीजा के नाम पर उनके देश में भारत से सिर्फ अकुशल लोग आ रहे हैं |
2) भारत की दिग्गज आई टी कंपनी एच् सी एल ने अपने आधिकारिक बयान में बताया की उनके यहाँ आने वाले नए कर्मचारियों में एक प्रतिशत भी कार्य कुशल नहीं हैं |
3) इसके कुछ दिनों बाद ही एक और दिग्गज कंपनी आई बी एम् ने बयान जारी कर बताया की कुशल कर्मचारियों की भारी कमी है |

सवाल ये उठता है की , कार्य करने के लिए उनका चुनाव कौन करता है जबाब एक ही है , चाटुकारिता |
भारतीय कंपनियां अक्सर आपको अपने मुनाफे को लेकर रोना रोती मिल जाएँगी, लेकिन इन सबका मूल कारण तो कुशलता की कमी है इस पर कोई बात करना नहीं चाहता |

विदेशी कम्पनियां और नए स्टार्ट अप जहाँ कुछ ही समय में हज़ारों करोड़ों की कम्पनी खड़ी कर लेते हैं , वहीं चाटुकारिता में फंसी हुई पूरानी भारतीए कम्पनियां काफी पीछे रह जाती हैं, अपने कार्य को कुशलता पूर्वक करने के लिए लगातार जहाँ अपने काम में नया पन लाने की जरूरत है वहीँ कम्पनियों को ऐसे कर्मचारियों की जरूरत है जो लगातार सीखते रहें और कार्यों में जायदा से ज्यादा दक्षता हासिल करें, लेकिन इसके बदले होता क्या है , मूल रूप से लाला तरीके से चलने वाली कम्पनियों में बस जी हजूरी और चाटुकारिता करते रहिये, मालिकों को भी सिर्फ चंद मुनाफों से ही मतलब होता है लेकिन भविष्य के लिए कोई भी कम्पनी को तैयार नहीं करना चाहता, क्योंकि उसके लिए बहुत ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है, और आज कल चलन है सब कुछ पाने का वो भी बिना मेहनत तो इसके लिए बस कॉपी पेस्ट कीजिये या फिर चाटुकारिता |

इन कारणों से जहाँ कुशल लोग अपनी नौकरी बदलने को मजबूर हैं वहीं कम्पनी को अपने कार्य करने और कम्पनी चलाने कि लिए कंसलटेंट रखने पड़ते हैं जो की मूल कर्मचारियों से कहीं ज्यादा महंगे होते हैं , और वो भी काम को समझ पाएंगे या नहीं इसकी कोई गारंटी नहीं है | लेकिन इतना सोचता कौन है जरूरत पड़ा तो बैंकों से लोन ले लेंगे या फिर कम्पनी बेच कर भाग जायेंगे ऐसी सोच कि साथ ज्यादातर भारतीय कम्पनियां अपना कारोबार कर रही हैं |

धीमी पड़ती कार्यशैली,घटता मुनाफा, बाजार की उठा पटक, उत्पाद और मानव कार्य कुशलता कि गुणवत्ता में भारी कमी, बढ़ती प्रतियोगिता इन सबका का एक ही जबाब है कार्य कुशल और मेहनती लोगों को ज्यादा से ज्यादा मौका देना |

लेकिन कहते हैं न जैसा बोओगे वैसा ही काटना पड़ेगा तो इसकी भरपाई भी कम्पनियों और उनके मालिकों को करना पड़ रहा, और अगर जल्द से जल्द बदलाव नहीं किया तो आगे भी करना पड़ेगा |

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